अभिजीत बनर्जी: जेएनयू, तिहाड़ जेल, नोटबंदी की आलोचना से नोबेल पुरस्कार तक






भारतीय मूल के अमरीकी अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी को इस साल अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिए जाने के बाद उनका भारतीय कनेक्शन मीडिया की सुर्खियों में हैं.
अभिजीत बनर्जी आज भले भारत के नागरिक नहीं हों लेकिन सही मायनों में उनकी पर्सनालिटी अखिल भारतीय रही है. यक़ीन ना हो तो देखिए. अभिजीत बनर्जी का जन्म मुंबई में हुआ था.
लेकिन उनकी पढ़ाई लिखाई पश्चिम बंगाल के कोलकाता शहर में हुई. जबकि उच्च शिक्षा के लिए वे नई दिल्ली में रहे.
उनके माता-पिता निर्मला और दीपक बनर्जी, इस देश के जाने माने अर्थशास्त्री रहे हैं. उनकी मां निर्मला मुंबई की थीं, जबकि पिता कोलकाता. ख़ास बात ये भी है कि अभिजीत बनर्जी का पूरा नाम अभिजीत विनायक बनर्जी है. इसमें बीच वाला विनायक, मुंबई के सिद्धि विनायक मंदिर का ही है.
अभिजीत बनर्जी ने कोलकाता के साउथ प्वाइंट स्कूल से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रेसीडेंसी कॉलेज से बैचलर डिग्री की हासिल की. इसके बाद वे जेएनयू चले आए, अर्थशास्त्र से एमए करने. 1981 से 1983 तक वे यहां पढ़ते रहे.
अभिजीत बनर्जी को कई बार इस सवाल का सामना करना पड़ा कि उन्होंने आख़िर पढ़ाई के लिए जेएनयू में आने का चुनाव क्यों किया. ये भी कहा जाता था कि शायद उन्होंने दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकॉनामिक्स में नामांकन नहीं मिला था.
लेकिन इस बारे में अभिजीत बनर्जी ने ख़ुद ही लिखा है, "सच्चाई ये है कि मैं डी-स्कूल (दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकॉनामिक्स) गया था और मेरे पिता भी शायद यही चाहते थे कि मैं वहां जाऊं. लेकिन जब से मैंने इन दोनों जगहों (जेएनयू और दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स) को देखा था मैंने अपना मन बना लिया था. जेएनयू की बात ही अलग थी. उसकी ख़ूबसूरती एक दम अलग तरह की थी. डी-स्कूल किसी भी दूसरे भारतीय संस्थान की तरह ही है. खादी या फ़ैब इंडिया का कुर्ता-पाजामा पहने छात्र जेएनयू के पत्थरों पर बैठकर ना जाने क्या-क्या बहस किया करते थे."

दस दिन की जेल





जेएनयू के बारे में वो आगे लिखते हैं.
"ये सच है कि मेरे अभी जो जिगरी दोस्त हैं वो सब डी-स्कूल गए थे. हालांकि मैंने जेएनयू में भी कई दोस्त बनाए. अरुण रमन, जानकी नायर, मनोज पांडेए, प्रगति महापात्रा, संजय शर्मा, शंकर रघुरामन, श्रीकुमार जी, और वेणु राजामोनी और न जाने कितने और क़रीबी दोस्त बने. लेकिन सबसे ख़ास बात रही जेएनयू के शिक्षक जिनसे मुझे मिलने का मौक़ा मिला. जेएनयू में पहले ही दिन मुझे प्रोफ़ेसर मुखर्जी और प्रोफ़ेसर सेनगुप्ता से बात करने का मौक़ा मिला जो मुझे आज भी याद है."
"पहले ही दिन मुझे प्रोफ़ेसर जैन को भी एक नज़र देखने का मौक़ा मिला. सबसे ज़्यादा मुझे इस बात पर आश्चर्य हुआ कि उन्होंने अर्थशास्त्र के बारे में बात की और ये भी बताया कि किसी भी मामले में अलग-अलग नज़रिया रखना कितना महत्वपूर्ण है. डी-स्कूल में मुझे सिर्फ़ ये सुनने को मिलता था कि उच्च शिक्षा के लिए कौन अमरीका चला गया या जाने वाला है. या फिर कौन आईआईएम जा रहा है. मैं जानता था कि मुझे कहां जाना है."
हालांकि अभिजीत बनर्जी ने शायद ही कभी सोचा होगा कि जब उनके नाम की चर्चा दुनिया भर में हो रही होगी, उसके बैकग्राउंड में उनके यूनिर्वसिटी का नाम भी साथ-साथ चलेगा. ये यूनिवर्सिटी पिछले कुछ समय से मोदी समर्थक और भारतीय जनता पार्टी समर्थकों के निशाने पर रहा है.




लेकिन ख़ास बात यह है कि फ़रवरी, 2016 में जब जेएनयू को लेकर हंगामा शुरू हुआ तभी अभिजीत बनर्जी ने हिंदुस्तान टाइम्स में एक लेख लिखा था- वी नीड थिंकिंग स्पेसेज लाइक जेएनयू एंड द गर्वनमेंट मस्ट स्टे आउट ऑफ़ इट यानि हमें जेएनयू जैसे सोचने विचारने वाले जगह की जरूरत और सरकार को निश्चित तौर पर वहां से बाहर रहना चाहिए.
इसी लेख में उन्होंने ये भी बताया था कि उन्हें किस तरह से 1983 में अपने दोस्तों के साथ तिहाड़ जेल में रहना पड़ा था, तब जेएनयू के वाइस चांसलर को इन छात्रों से अपनी जान को ख़तरा हुआ था. अपने आलेख में उन्होंने लिखा था, "ये 1983 की गर्मियों की बात है. हमलोग जेएनयू के छात्रों ने वाइस चांसलर का घेराव किया था. वे उस वक्त हमारे स्टुडेंट यूनियन के अध्यक्ष को कैंपस से निष्कासित करना चाहते थे. घेराव प्रदर्शन के दौरान देश में कांग्रेस की सरकार थी पुलिस आकर सैकडों छात्रों को उठाकर ले गए. हमें दस दिन तक तिहाड़ जेल में रहना पड़ा था, पिटाई भी हुई थी. लेकिन तब राजद्रोह जैसा मुकदमा नहीं होता था. हत्या की कोशिश के आरोप लगे थे. दस दिन जेल में रहना पड़ा था."

मोदी सरकार की आलोचना

तो केवल जेएनयू कनेक्शन के चलते अभिजीत बनर्जी विपक्षी खेमे में नहीं हैं, बल्कि वे समय समय पर मोदी सरकार की नीतियों की ख़ूब आलोचना कर चुके हैं. उन्होंने इसके साथ ही विपक्षी कांग्रेस पार्टी की मुख्य चुनावी अभियान का खाका तैयार कर चुके हैं. दोनों को मिलाकर देखें तो अभिजीत बनर्जी एंटी-नेशनल कैटेगरी में आते हैं लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने उन्होंने पुरस्कार जीतने की बधाई दे दी है.
मोदी सरकार के सबसे बड़े आर्थिक फैसले नोटबंदी के ठीक पचास दिन बाद फोर्ड फाउंडेशन-एमआईटी में इंटरनेशनल प्रोफेसर ऑफ़ इकॉनामिक्स बनर्जी ने न्यूज़ 18 को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, "मैं इस फ़ैसले के पीछे के लॉजिक को नहीं समझ पाया हूं. जैसे कि 2000 रुपये के नोट क्यों जारी किए गए हैं. मेरे ख्याल से इस फ़ैसले के चलते जितना संकट बताया जा रहा है उससे यह संकट कहीं ज्यादा बड़ा है."
इतना ही नहीं वे उन 108 अर्थशास्त्रियों के पैनल में शामिल रहे जिन्होंने मोदी सरकार पर देश के जीडीपी के वास्तविक आंकडों में हेरफेर करने का आरोप लगाया था. इसमें ज्यां द्रेज, जायति घोष, रीतिका खेरा जैसे अर्थशास्त्री शामिल थे.
जब अभिजीत बनर्जी को नोबेल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई तो कई अर्थशास्त्रियों ने उनके योगदान को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के हार्ड वर्क से जोड़कर बताना शुरू किया है. यह एक तरह के प्रधानमंत्री मोदी के उस बयान के चलते ही किया गया जिसमें उन्होंने कहा था- हार्ड वर्क हार्वर्ड से कहीं ज़्यादा ताक़तवर होता है.

पार्टनर भी नोबेल विद्वान

तीन लोगों में अभिजीत बनर्जी की पार्टनर इश्तर डूफ़लो भी शामिल हैं, जो अर्थशास्त्र में नोबेल जीतने वाली सबसे कम उम्र की महिला हैं. अर्थशास्त्र में नोबेल जीतने वाली वे महज दूसरी महिला हैं.
पुरस्कार की घोषणा होने के बाद इश्तर डूफेलो ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा है, "महिलाएं भी कामयाब हो सकती हैं ये देखकर कई महिलाओं को प्रेरणा मिलेगी और कई पुरुष औरतों को उनका सम्मान दे पाएंगे."




डूफ़ेलो से पहले अभिजीत बनर्जी ने पहली शादी अरुंधति तुली बनर्जी से की थी, तुली भी एमआईटी में साहित्य की लेक्चरर हैं. अभिजीत और अरुंधती, कोलकाता में एक साथ पढ़ा करते थे और साथ ही एमआईटी पहुंचे. दोनों का एक बेटा भी है. हालांकि बाद में दोनों अलग हो गए.
फिर अभिजीत के जीवन में एमआईटी की प्रोफेसर इश्थर डूफ़ेलो आईं. इन दोनों का भी एक बेटा है. ये लोग शादी से पहले ही लिव इन में रहने लगे थे. बेटे के जन्म के तीन साल बाद 2015 में दोनों ने शादी की.

प्राइज़ मनी में क्या मिलेगा

इस साल इकॉनमी के नोबेल पुरस्कार विजेताओं को 9.18 लाख अमरीकी डॉलर का पुरस्कार मिला है. ये पुरस्कार विजेताओं को आपस में बांटने होते हैं.
यानी माइकल क्रेमर का हिस्सा रहने दें तो अभिजीत बनर्जी -इ्श्तर डूफ़ेलो को 6.12 लाख अमरीकी डॉलर मिलेंगे. अनुमान के हिसाब से देखें तो यही कोई चार करोड़ रुपये की रकम इन दोनों को मिलेगी.

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